साहित्य-संसार

Sunday, March 26, 2006

रहस्य

जैसा था जितना था
जीया मुकम्मल
कल के गणित में खपाया नहीं सिर
गुम्बदों मीनारों की ओर
निहारने की कोशिश भी नहीं
सीना तानकर झेला सारे प्रश्नों के तीर
चमकता रहा उसकी देह का खारापन
दिन भर
महका जितना महक सकता है
एक साबुत फूल दिन भर
गाया उतने ही अंतरे
जितना आम पकने के मौसम में कोयल
रहस्य
मनमाफ़िक नींद का
नींद में शीतल सपनों का
और कुछ भी नहीं था


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